Poetry – My Love
बेगाना
माना कभी अपना न बन सके पर उसने कभी बेगाना भी तो नहीं कहा
हसते रहे रोते रहे और क्या करते उसने कभी चुप होजाना भी तो नहीं कहा
प्यार तो करते हैं हम एक ज़माने से पर उसने कभी दीवाना भी तो नहीं कहा
देख कर हमें चाहे मुह फिर लिया पर उसने कभी हमें अंजना भी तो नहीं कहा
सोचा फिर एक दिन कि मर जाएँ पर उसने कभी मरजाना भी तो नहीं कहा|
प्रीत
पगली हाँ सबतों वड्डी मैं कहान्दी,
जिंद कटलां मैं तेरी राहांच पलकां विछांदी |
उमीदां वड्डियाँ कित्तियाँ कतल अपनी है,
पर रोज़ सवेरे इक उम्मीद होर जुड़ जांदी |
सबर कर लेंदी तेरा सुपना वेख कर,
पर यादांच तेरी अस्सां निन्द्रां वी गवांदी |
करदी हाँ तेरी शिकायत रब तों रोज़ पर,
लगदा है एन्नी दूर मेरी वाजां नी जांदी |
जिंदगी तां मेरी कदों दी परायी होई,
अज्ज तां मौत नू वी मेरी सूरत नी सुहांदी |
तू वी कर लईं मेरा थोडाजा खयाल यारा,
मैं तो रवांगी अपनी प्रीत निभांदी |
ऋचा
चंचल शीतल उज्वल निर्मल
पंखुड़ी जैसी है वो कोमल
लहराती बहलाती बलखाती इठलाती
नदी सी है वो नटखट
उछलती कूदती चलती ठहरती
पवन सी है वो सरपट
सुनहरी सलेटी गुलाबी सफ़ेद
निशा सी है वो सुंदर
पवित्र मधुर सुरीली अकथ
ऋचा सी है वो पावन
पहला इज़हार
दिल कहे तुमसे हुआ हमको प्यार
इज़ाजत जो हो तो करें इज़हार
करवालो करेंगे उम्र भर इंतज़ार
पर गुज़ारिश है इतनी ना करना इंकार
कविता मेरी
जो थी कभी मेरी अपनी, ना जाने क्यों परायी हो रही है
जानी पहचानी लगती थी, कैसे गुमनाम हो रही है
कोशिश की बहुत समझने की, फिर भी बेमानी सी हो रही है
हर शब्द याद है मुझे, पर कविता मेरी खो रही है
खुदगर्ज़
खुदगर्ज़ हैं वो जो अपने प्यार पर गुमां करते हैं
नहीं जानते कि मोहोब्बत सभी को होती है
पर जिंदा है वोही, जो बस उनके नाम पर मरते हैं
ख्वाहिशें करना ही काफी नहीं है उनके मिलने की
तूफानों से गुज़र सकते हैं हर कोई यहाँ
पर मंज़िल मिली है उन्हें जो उम्र भर उम्मीद के साथ चल सकते हैं
अरमां
यूं मसला अरमानों को कि खुद को मिटाते चले गए
हसते रहे तेरी बेवफाई पर और दिल को रुलाते चले गए
बसाई जो ख्वाबों की बस्ती उसका हर तिनका लुटाता चले गए
कुछ ना पूछो अब हम से कि हम खुद को भुलाते चले गए
राज़
राज़ क्या है जिंदगी का नहीं ये कोई भी जान पाया
कहीँ ख़ुशी का उजाला है तो कहीँ ग़मों का काला साया
कहीँ खुद ही से लड़ती रूह है तो कहीँ जलती हुई नश्वर काया
इक वृत्त जैसी लगती है कि खो जाती है वैसे, जैसे था पाया
क्यों भटके है तू राही कि इक ही ओर इसने सबको ले जाना
बचपना है कि हर चीज़ पाने को मचले सब जानती है कि बुढ़ापा है छाया
राज़ क्या है जिंदगी का नहीं ये कोई भी जान पाया
जाम ए शाम
ना पैमाना लबों तक पंहुचा
ना ही पीया हमने कोई ज़ाम
बहोत ख़ूब गुज़री फिर भी
नशे मैं रहे हम कल की शाम
होश
होश वालों शिक्वा ना करो
हम भी होश की बातें करेंगे हमें ज़रा होश में तो आने दो
ख़्वाब लेने का हक सबका है
ख़्वाब होंगे हमारे भी सच्चे ज़रा झूठे ख्वाब से बाहर तो आने दो
चाहत
तुम्हे बस चाहते जाने को जी चाहता है
आज कुछ कर जाने को जी चाहता है
तुम्हारे संग जीने को जी चाहता है
तुम पर मिट जाने को जी चाहता है
चाहते हैं हम तुम्हे जितना उतना
आज बस कह जाने को जी चाहता है
हमें चाहत हो सिर्फ तुम्हारी
ऐसी चाहत हो ये जी चाहता है
दिल पर ज़ोर नही है पर
ये दिल सिर्फ तुम्हे चाहे ये जी चाहता है
महोब्बत की ग़र कोई हद होती है तो
आज उस हद से गुज़र जाने को जी चाहता है
जो देखा तुमको एक बार हमने
तो अब देखते जाने को जी चाहता है