राज़

राज़ क्या है जिंदगी का नहीं ये कोई भी जान पाया
कहीं ख़ुशी का उजाला है तो कहीं ग़मों का काला साया
कहीं खुद ही से लड़ती रूह है तो कहीं जलती हुई नश्वर काया
इक वृत्त जैसी लगती है कि खो जाती है वैसे, जैसे था पाया
क्यों भटके है तू राही कि इक ही ओर इसने सबको ले जाना
बचपना है कि हर चीज़ पाने को मचले सब जानती है कि बुढ़ापा है छाया
राज़ क्या है जिंदगी का नहीं ये कोई भी जान पाया

अरमां

यूं मसला अरमानों को कि खुद को मिटाते चले गए
हसते रहे तेरी बेवफाई पर और दिल को रुलाते चले गए
बसाई जो ख्वाबों की बस्ती उसका हर तिनका लुटाता चले गए
कुछ ना पूछो अब हम से कि हम खुद को भुलाते चले गए

खुदगर्ज़

खुदगर्ज़ हैं वो जो अपने प्यार पर गुमां करते हैं
नहीं जानते कि महोब्बत सभी को होती है
पर जिंदा हैं वोही, जो बस उनके नाम पर मरते हैं
ख्वाहिशें करना ही काफी नहीं है उनके मिलने की
तूफानों से गुज़र सकता है हर कोई यहाँ
पर मंज़िल मिली है उन्हें जो उम्र भर उम्मीद के साथ चल सकते हैं

कविता मेरी

जो थी कभी मेरी अपनी, ना जाने क्यों परायी हो रही है
जानी पहचानी लगती थी, कैसे गुमनाम हो रही है
कोशिश की बहुत समझने की, फिर भी बेमानी सी हो रही है
हर शब्द याद है मुझे, पर कविता मेरी खो रही है