खुदगर्ज़

खुदगर्ज़ हैं वो जो अपने प्यार पर गुमां करते हैं
नहीं जानते कि महोब्बत सभी को होती है
पर जिंदा हैं वोही, जो बस उनके नाम पर मरते हैं
ख्वाहिशें करना ही काफी नहीं है उनके मिलने की
तूफानों से गुज़र सकता है हर कोई यहाँ
पर मंज़िल मिली है उन्हें जो उम्र भर उम्मीद के साथ चल सकते हैं

कविता मेरी

जो थी कभी मेरी अपनी, ना जाने क्यों परायी हो रही है
जानी पहचानी लगती थी, कैसे गुमनाम हो रही है
कोशिश की बहुत समझने की, फिर भी बेमानी सी हो रही है
हर शब्द याद है मुझे, पर कविता मेरी खो रही है

ऋचा

चंचल शीतल उज्वल निर्मल
पंखुड़ी जैसी है वो कोमल
लहराती बहलाती बलखाती इठलाती
नदी सी है वो नटखट
उछलती कूदती चलती ठहरती
पवन सी है वो सरपट
सुनहरी सलेटी गुलाबी सफ़ेद
निशा सी है वो सुंदर
पवित्र मधुर सुरीली अकथ
ऋचा सी है वो पावन

प्रीत

पगली हाँ सबतों वड्डी मैं कहान्दी,
जिंद कटलां मैं तेरी राहांच पलकां विछांदी |
उमीदां वड्डियाँ कित्तियाँ कतल अपनी है,
पर रोज़ सवेरे इक उम्मीद होर जुड़ जांदी |
सबर कर लेंदी तेरा सुपना वेख कर,
पर यादांच तेरी अस्सां निन्द्रां वी गवांदी |
करदी हाँ तेरी शिकायत रब तों रोज़ पर,
लगदा है एन्नी दूर मेरी वाजां नी जांदी |
जिंदगी तां मेरी कदों दी परायी होई,
अज्ज तां मौत नू वी मेरी सूरत नी सुहांदी |
तू वी कर लईं मेरा थोडाजा खयाल यारा,
मैं तो रवांगी अपनी प्रीत निभांदी |