राज़

राज़ क्या है जिंदगी का नहीं ये कोई भी जान पाया
कहीं ख़ुशी का उजाला है तो कहीं ग़मों का काला साया
कहीं खुद ही से लड़ती रूह है तो कहीं जलती हुई नश्वर काया
इक वृत्त जैसी लगती है कि खो जाती है वैसे, जैसे था पाया
क्यों भटके है तू राही कि इक ही ओर इसने सबको ले जाना
बचपना है कि हर चीज़ पाने को मचले सब जानती है कि बुढ़ापा है छाया
राज़ क्या है जिंदगी का नहीं ये कोई भी जान पाया

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