प्रीत

पगली हाँ सबतों वड्डी मैं कहान्दी,
जिंद कटलां मैं तेरी राहांच पलकां विछांदी |
उमीदां वड्डियाँ कित्तियाँ कतल अपनी है,
पर रोज़ सवेरे इक उम्मीद होर जुड़ जांदी |
सबर कर लेंदी तेरा सुपना वेख कर,
पर यादांच तेरी अस्सां निन्द्रां वी गवांदी |
करदी हाँ तेरी शिकायत रब तों रोज़ पर,
लगदा है एन्नी दूर मेरी वाजां नी जांदी |
जिंदगी तां मेरी कदों दी परायी होई,
अज्ज तां मौत नू वी मेरी सूरत नी सुहांदी |
तू वी कर लईं मेरा थोडाजा खयाल यारा,
मैं तो रवांगी अपनी प्रीत निभांदी |

बेगाना

माना कभी अपना न बन सके पर उसने कभी बेगाना भी तो नहीं कहा
हसते रहे रोते रहे और क्या करते उसने कभी चुप होजाना भी तो नहीं कहा
प्यार तो करते हैं हम एक ज़माने से पर उसने कभी दीवाना भी तो नहीं कहा
देख कर हमें चाहे मुह फिर लिया पर उसने कभी हमें अंजना भी तो नहीं कहा
सोचा फिर एक दिन कि मर जाएँ पर उसने कभी मरजाना भी तो नहीं कहा|