अरमां

यूं मसला अरमानों को कि खुद को मिटाते चले गए
हसते रहे तेरी बेवफाई पर और दिल को रुलाते चले गए
बसाई जो ख्वाबों की बस्ती उसका हर तिनका लुटाता चले गए
कुछ ना पूछो अब हम से कि हम खुद को भुलाते चले गए

खुदगर्ज़

खुदगर्ज़ हैं वो जो अपने प्यार पर गुमां करते हैं
नहीं जानते कि महोब्बत सभी को होती है
पर जिंदा हैं वोही, जो बस उनके नाम पर मरते हैं
ख्वाहिशें करना ही काफी नहीं है उनके मिलने की
तूफानों से गुज़र सकता है हर कोई यहाँ
पर मंज़िल मिली है उन्हें जो उम्र भर उम्मीद के साथ चल सकते हैं

कविता मेरी

जो थी कभी मेरी अपनी, ना जाने क्यों परायी हो रही है
जानी पहचानी लगती थी, कैसे गुमनाम हो रही है
कोशिश की बहुत समझने की, फिर भी बेमानी सी हो रही है
हर शब्द याद है मुझे, पर कविता मेरी खो रही है

ऋचा

चंचल शीतल उज्वल निर्मल
पंखुड़ी जैसी है वो कोमल
लहराती बहलाती बलखाती इठलाती
नदी सी है वो नटखट
उछलती कूदती चलती ठहरती
पवन सी है वो सरपट
सुनहरी सलेटी गुलाबी सफ़ेद
निशा सी है वो सुंदर
पवित्र मधुर सुरीली अकथ
ऋचा सी है वो पावन